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Hymn No. 2120 | Date: 06-Jan-2001
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राज खुलता गया एक एक करके तुझसे मिलने का, डर निकलता गया तुझसे बिछुड़ने का।
राज खुलता गया एक एक करके तुझसे मिलने का, डर निकलता गया तुझसे बिछुड़ने का।
ज्यों ज्यों महफिलों का दौर पे दौर चलता रहा, हमपे तेरे प्यार का नशा छाता गया।
जिन कहानियों को बचपन में सुना था, उसको घटते देखने लगा जीवन में।
रहा न अब कुछ हाथों में, जब से तेरा साथ रास आ गया इस दिल को।
पहले पहल सब कुछ कहने को करता था मन, अब तो गुमसुम सा होके निहारने का करता है दिल
खिलखिलाहट बदल गयी आधी अधुरी मुस्कान में, निगाहें करती है चुपचाप तेरे प्यार का रसपान जो।
अब न चाहता हूँ करना कोई जिद्द, तेरे न बहाने पे बिसार देना चाहता हूँ जीवन यादों मे।
हाँ अभी भी तरसता हूँ तेरे पास रहके, दे देता है तू न जाने मुझको कितना कुछ।
रचता नहीं अब दिल को तेरे सिवाय कुछ, मन दौड़ ले चाहे कितना कुछ इधर – उधर।
- डॉ.संतोष सिंह
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तान तान के चिल्लाता हूँ निकल जाये कोई ऐसा राग जो भड़का जाये मेरे प्यार को।
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बड़ी बात है, बड़ी बात है तुझसे जुड़के देखा हुआ हर ख्वाब मेरे लिये बड़ी बात है।
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