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Hymn No. 2123 | Date: 07-Jan-2001
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जीवन दिया हुआ है तेरा, जीना चाहता हूँ अनुरूप तेरे।
जीवन दिया हुआ है तेरा, जीना चाहता हूँ अनुरूप तेरे।
धोर होंगे मेरे करम अधोर बनना चाहता हूँ रहके संग तेरे।
छू ना सके जीवन की कोई भी विसंगति, बन जाऊँ निःसंग संग तेरे।
दंग न कर पाये कोई भी घटना जुटा रहूँ इतना प्यार में तेरे।
दौर आये कोई भी सुख दुःख से भरे, चलता रहे सतत प्रयास तुझे अपना बनाने का।
मायावी जग की छाप न पडे मेरे अंतर पे, भरा रहे दिल भक्ति भाव से।
कमी हो जाये जीवन में कितनी भी, नमी अपने आँखो में तेरे विरह में।
जादू न चले कोई भी मुझपे, अनवरत् रहूं डुबा तेरे प्यार की मस्ती में।
कितनी भी करे कोई टीका टिपण्णी छड़ला रहूँ में नये नये जाग तेरे ।
हंसी का कितना भी बनूं पात्र पर मेरा प्रयास गंभीरता भरा तेरे वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह