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Hymn No. 2125 | Date: 10-Jan-2001
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तलाश रहा हूँ मंजिल को, मंजिल के पास खड़े होके।
तलाश रहा हूँ मंजिल को, मंजिल के पास खड़े होके।
लोंग ढूँढ़ते है यार का, यार तो मिल गया, प्यार नहीं कर पा रहा हूं।
बना बैठा हूँ ख्वाबों में मायापति, इच्छाओं का दास बनके।
वास तो है दिल में प्रियतम का, फिर भी खोजूँ सारे जहाँ में।
पूर्ण समर्थ के साथ रहके, बना बैठा हूँ मजबूर।
प्रकाशित करे जो जग को, रहके पास उसके बना बैठा हूँ अंधा।
करनी में असमर्थ देता हूँ दोष बैठे – बैठे किस्मत को।
दुनिया के रंग में रंगने वास्ते, अपनो का साथ छोड़ बैठा हूँ।
अविनाशी की किमत न करके, कर बैठा हूँ नाशवान की चाहत।
अपनी आदतों को न बदलके, देता हूँ दोष मन के बहकाने वालों को।


- डॉ.संतोष सिंह