VIEW HYMN

Hymn No. 2126 | Date: 10-Jan-2001
Text Size
क्या फर्क पड़ता है मुझको, तुझ साक्षात्, को साकार स्वरूप लेने को कहने का।
क्या फर्क पड़ता है मुझको, तुझ साक्षात्, को साकार स्वरूप लेने को कहने का।
बसता है तू मेरे दिल में, जब चाहे तब झुका के पलके करता हूँ दीदार न जाने कितने रुपो में।
क्या फर्क पड़ता है मुझको तुझसे तेरी चुप्पी तोड़के, कुछ कहने सुनाने को।
समस्त सृष्टि में जो भी गूंजे बोल, उसमें तू नये नये तराने गाके अनेको तरीको से सुनाये।
क्या फर्क पड़ता है मुझको, कहूँ तुझको तू अपना गुढ राज बता दें।
जब प्रकटेगा दिल में मेरे बेइतहा प्यार तेरे वास्ते, बिन कहे हो जाऊंगा तेरा हमराज।
क्या फर्क पड़ता है मुझको, अपनी मनोव्यथा गिड़गिड़ाके सुनाऊँ तुझको।
कमजोर बनके दया से कुछ पाना नहीं चाहता, समर्थ ऐसा बनूं तू फख्र करें मुझपे।
क्या फर्क पड़ता हें मुझको, ऐं अविनाशी तुझसे कहूं तू दे दे नाशवान सारा संसार।
मैं तो दिल सें हुंकार भरके टिक जाना चाहता हूँ संसार से, मौजे बनूं तेरे महासागर की।


- डॉ.संतोष सिंह