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Hymn No. 2127 | Date: 11-Jan-2001
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थिरकते है कदम जब उछलते है अरमा दिलो में, साकार हो जाने के वास्ते।
थिरकते है कदम जब उछलते है अरमा दिलो में, साकार हो जाने के वास्ते।
तूने तो रच डाला बंद आंखो से सारे जहाँ को ख्वाबो में अपने।
यहाँ तो यथार्थ में कुछ करने के वास्ते, न जाने करना पड़ता है कितना पुरुषार्थ।
इक छोटी सी भूल फेर जाती है पानी, हमारे सारे किये धरे पे।
तेरे ख्वाबों में डाले कोई विघ्न तो करे तू उसका नाश बेंहिचक।
कैसे तू देंखता है हमारे तिनकों से बुने संसार को उजड़ते हुये।
ऊँगली उठाता न हूँ तेरी और, पर मन की व्यथा सुनाना न चाहूँ किसी और को।
बदलना न तू मेरे वास्ते, सुनके टाल देना हौले से मुस्कराते हुये मेरी बातों को।
उस मुस्कराहट पे इस जिंदगी को क्या, न जाने कितनी जिंदगी कर जाऊँगा कुर्बान।
वजूद होगा इस जहाँ में तो सिर्फ तेरा, इस नाशवान को न चाहत है मौजूदगी की।
- डॉ.संतोष सिंह
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क्या फर्क पड़ता है मुझको, तुझ साक्षात्, को साकार स्वरूप लेने को कहने का।
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हिमाकत हमको कर न था, पर कर डाला मन के कहने से तुझसे कुछ कहने का।
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