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Hymn No. 2128 | Date: 11-Jan-2001
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हिमाकत हमको कर न था, पर कर डाला मन के कहने से तुझसे कुछ कहने का।
हिमाकत हमको कर न था, पर कर डाला मन के कहने से तुझसे कुछ कहने का।
निठल्ला हूँ मुरखाई से भरा, दिलवाला भी नही जो रिझा सकूं तेरे दिल को।
ऐ मस्ती का जाम पिलानेवाले, तोड़ देता हूं तेरे दिल के अरमानों करतूतों से अपनी।
बदलते देखा दुनिया को, बदल न पाया अपनी फितरतें को जो मिटाने पे है तुली।
सलाम बजाती हूँ ऐ मेरे मौला, सब कुछ जानते हुये रखा है तू अपनी खिदमत में।
बदमाश नहीं हूँ मैं, मारा हूँ अपने आलस का जिसपे ठप्पा लेगा रखा हूँ विश्वास का।
छेद दे मेरे मन को, व्यंग भरे बाणों से जिसमें भरे है अनचाहे विचार तेरे नाम पे।
कोई बात नहीं चाहे बिगड़ जाये मेरी कितनी भी दशा, पर रहना तू मुझमें बस।
गच्चा खाया हूँ बहुत बार पर गच्चा देना नहीं चाहता हूँ, तुझको हो जाये चाहे कुछ मुझको।
वैंसे तो तू जानता है सब कुछ पर देता हूँ बता मर जाऊँगा बेंमौत पर पीठ ना दिखाऊँगा कभी।
- डॉ.संतोष सिंह
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थिरकते है कदम जब उछलते है अरमा दिलो में, साकार हो जाने के वास्ते।
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