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Hymn No. 2131 | Date: 14-Jan-2001
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विकलताओं से भरा है जीवन सारा, कब क्या घट जाये कौन जाने।
विकलताओं से भरा है जीवन सारा, कब क्या घट जाये कौन जाने।
आसान है कह देना सब लीला है प्रभु की, संसार सागर के है ये सब तूफाँ अलग अलग।
घटे जिसके साथ झकझोर जाती हैं जीवन को, ये कैसी अग्निपरीक्षा लेता है तू।
इक् तरफ बजे खुशियों की शहनाई, दूजी और करूण क्रंदन स्तब्ध कर जाये सबको।
उम्र की नाव देता है पार उतरने को, किसीकी मजबूत किसी में रहते है सैंकड़ों छेद पहले से।
कोई आने से पहले दम तोड़ दे किनारे पे, कोई एक से सौ की गिनती पूरी करके न कर पाये कुछ।
अनहोनियो के जहां में निश्चित सा है सब कुछ लगता, दिल प्यार करने से पहले अब है हर जाता।
ऊंगली दिखाने नहीं आया हूँ, पर बयां कर जाना चाहता हूँ अपने मन की व्यथा को।
चरमा सकता है तू सबपे कर्मों का कोई न कोई बकाया, पर क्या ये सच है हमने तुझे था इतना छकाया।
अविश्वास कही न जन्मा है हममें, जब तुझे अपना माना तो कह डाला अंतर की।
- डॉ.संतोष सिंह
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गुनगुनाऊँ बनके भौरा तेरी बगियाँ में, खिल जाऊँ कमलवत् तेरी मायावी दुनिया में।
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बड़ी मुश्किल बात है इतना कमजोर क्यूं बनाया तूने हमको।
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