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Hymn No. 2133 | Date: 16-Jan-2001
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मेहरबानी, मेहरबानी, तेरी मेहरबानी न जाने कितनी असंख्य है हमपे तेरी मेहरबानी।
मेहरबानी, मेहरबानी, तेरी मेहरबानी न जाने कितनी असंख्य है हमपे तेरी मेहरबानी।
श्वास दर श्वास लूँ तेरा नाम फिर भी तेरी मेहरबानियों के सामने कोई बानगी नहीं है।
नये नये नगमें सुनाता फिरूं चाहे हर पल तेरी मेहरबानियों के बिना उमड़ नहीं अंतर से।
तेरी गाथा सुनाऊँ कितनी भी लोगों को तेरी मेहरबानियों के बिना निकले न मेरे मुख से।
कद्रदान हूँ मैं बहुत बड़ा तेरी मेहरबानियों का फिर भी सिलसिला चलाये रखते मेहरबानियों का।
मेरे वश की बात न हैं कुछ कर दिखाना, सच पूछो तो हर कार्य को अंजाम पे पहुचाये तेरी मेहरबानी।
करने चले तेरी मेहरबानियों का शुक्रियाँ अदा, असंख्य जन्म खप जायेगे तब भी न होगी पुरी।
आंसु बहते बहते सूख सकते है, बया करते करते वाणी लोप हो सकती है पर ना होगी खत्म तेरी मेहरबानी
दिल से उमड़ते भावों में बहके कह दूँ कितना भी कुछ, पर तेरी मेहरबानियों के आगे ना है वो कुछ।
पल भर भी न गुजरे तेरी मेहरबानीयों के बिना, जीवन का हर लम्हां कर दूं तेरे नाम तेरी मेहरबानियों के बिना है वो बेजान।
- डॉ.संतोष सिंह
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