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Hymn No. 2134 | Date: 17-Jan-2001
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आभार मानता हूँ तेरा जो देता है मौका इस नाचीज को बिना लायकी के।
आभार मानता हूँ तेरा जो देता है मौका इस नाचीज को बिना लायकी के।
बरसाता है कृपा न जाने कितनी, जो कर लेता हूँ संगत तेरी महफिल का।
एक से एक कोहिनूर बटोर रखे है तूने, उनके बीच मिल जाता है स्थान हमको।
गुमांन् करने लायक न है पास मेरे कुछ, तो भी तू रखता है माथे पे हाथ।
अभागे का सद्भाग्य जाग उठा, जो भाग्य विधाता के दर पे पहुँच गया।
जो तान तू छेड़ दे तो बेभान कर जाये ऐसा परम दान तूने हमको दे दिया।
इस बेजान की न थी कोई कीमत, अपना नाम चस्पा कर दे दिया जीवन को नया आयाम।
मुसाफिरी कर रहा था बेमंजिल के, राह को छोड़ तूने तो मंजिल की झलक दिखा दिया।
गर्दिशों में गुजरते थे दिन, उभारके, कुछ कर दिखाने की ललक भर दिया मन में।
मत मानों यारों कोई बात मेरी बेसिर पर लगेगी, पर जब जब हुआ उदास तो कराया दिल को नवजीवन


- डॉ.संतोष सिंह