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Hymn No. 2138 | Date: 19-Jan-2001
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वादा किया न जाने कितना, निभा न पाया कोई भी।
वादा किया न जाने कितना, निभा न पाया कोई भी।
हमें उबारने के वास्ते लगाया चक्कर जहाँ का न जाने कितनी बार।
मत पुंछो सैलाब था गल्तियों का, खामियाजा भूगतना पडा तुझको।
तेरे साथ रहते हुये न जान सका दर्द दिल का तेरे।
सवाल दर सवाल करता गया सिखा नही सुलझाना सवालो का।
समझने का किया बहाना समझाने का रखा ना कोई मतलब।
किसी की बात का रोना रोऊँ, जिंदगी जो बन गयी ऐतराज ।
रागों का कोई दोष न था, रागों के जो डूबना चाहा हमने।
मांगा भी तो खाक का मांगा तुझसे, शाश्वत को भुलाके।
तू ने क्या न करना चाहा पर मौका रहते हुये न दिया तुझको।


- डॉ.संतोष सिंह