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Hymn No. 2139 | Date: 20-Jan-2001
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मुझे नही पता है तुझे पाने के वास्ते क्या करना।
मुझे नही पता है तुझे पाने के वास्ते क्या करना।
आँखे होते हुये हूँ अंधा, बुध्दि होते हुये अज्ञानी।
जिस और ले चलेगा तू, उस और जाना है मुझको।
जो भी समझे जमाना, पर ना मुझे भरम में है रहना।
धरम के कायदे मैं, क्या जानू, दिल की बात में क्या पहचानूँ।
बहुत बड़ा पुरूषार्थी तो नहीं मैं, जो जीत ले सतत् कर्म यज्ञ करके।
मर्म न जाना तेरा जो भी सुनाया, यहाँ वहाँ का सुनके।
ऐसा कुछ न है अनोखा जिससे रिझा सकूँ मैं तुझको।
गुमा कर सके तू मुझपे, ऐसा करना न जाना कभी।
रट्टू समझ या लट्टू तोते की तरह मानता हूँ तुझे अपना।


- डॉ.संतोष सिंह