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Hymn No. 2141 | Date: 22-Jan-2001
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प्रभु तेरी तू जाने पर अपने मन की कहे बिन रह न पाऊँ।
प्रभु तेरी तू जाने पर अपने मन की कहे बिन रह न पाऊँ।
विचित्रताओं से भरी दुनिया बनायी तूने न जाने क्या सोंच सोंचके।
हमने भी किया कॉफी विरोध आसों से भरके मन को रंगा तेरे रंग में।
तूने तो रंगा तन और प्रकृति को नयनाभिराम रूपों में मनमोहन लेने को।
हम भी कम ना निकले रंग ना सके तेरे प्यार से तो, रंग ढाला ईच्छाओं से।
न जाने कितनी बार तू आया, अपने लिये हुये का नये नये तरीको से राज समझाया।
दाद देनी पड़ेगी हमारी, तेरी बातों का पलक झपकते नया अर्थ बतलाया।
फिर भी तूने न मानी हार, कई राह होते हुये दिखायी एक और नई राह।
इतनी से ना मिली राहत, इक बार फिर से कर डाला आहत, इक नयी चाहत जन्म देके।
गुस्ताखी की सजा मिलनी तो तय थी, पर चाहत के छोर से बंधा था प्रभु के पन्नों में।
बदल न सका प्रभु जिसे तू, बदल डाला इक् नयी चाहत को जन्म देके।
करना कुछ भी कोई तुझसे सीखे, करके चुपचाप दे देता और नाम।


- डॉ.संतोष सिंह