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Hymn No. 211 | Date: 15-Jul-1998
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जगा दे, जगा दे, जगा दे हमारे अंदर सोये हुये को जगा दे,
जगा दे, जगा दे, जगा दे हमारे अंदर सोये हुये को जगा दे,
उस परम परमात्मा का रूप हम सबमे है, हम तो उस आईने के इक् पहलू है ।
भीतर से एक है, बाहर से अलग – अलग जैसें नारियल का फल,
हमारे मन के उस के पहलू को तोड़ दे; प्रेम भरी निगाहो से ।
भेद मिट जायेगा, हमारी नजरों का, प्रेम में तेरे तुझको सबमे देखेंगे,
तुझको हर मन-मंदिर में देख – देखके गीत गाते रहेगे तेरा ।
मस्कुराते रहेगे सबको देखके यूँ ही, हर चेहरा पहचाना लगेगा;
हम तो तेरे दीवाने हो जायेगे, तेरी दीवानगी में ना कोई छोटा या बड़ा होगा।
तू इक् सब जगह है, तेरे ही सब प्रतिरूप है, हमारी नजरों के भेद से अलग – अलग है।
तू करूणामय है, प्रेमवश हो के देंगा तू विश्वरूप में दर्शन इक् दिन ।


- डॉ.संतोष सिंह