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Hymn No. 212 | Date: 15-Jul-1998
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मेरे गुरू की हर बात है निराली, ऊपर से लगती है खाली;
मेरे गुरू की हर बात है निराली, ऊपर से लगती है खाली;
पर अंदर से रहती है, उतनी गहरी मीठी ।
ऊपर से उलझी हुई रहके, हर बात जाती है सुलझा;
मन ही मन में उपजे हुये कितनें सवालों का दे जाती है जवाब ।
बात तो है निराली, पर उनकी हर अदा उससे भी है प्यारी,
मन को छेडते हुये दिलों को गुदगुदा जाती है।
हम अपने आपको भूल जाते है, बस हसरत भरीं निगाहो से देखते है उनको;
एक – एक पल करके कई - कई घंटे बीत जाते है, अहसास ना होता वक्त के बीतने का।
मेरे गुरू की शायरी की तू मत पूछ, सुनते सुनते इतना बेसुध हो जाता हूँ;
मन की हर बंदिश टूटती नजर आती है।
शायरी में खुद कोई पंक्ति बनके समा जाने का मन करता है;
या फिर उनकी कलम की स्याही बन जाने का मन करता है ।
मेरे गुरू के आगे सब कुछ है फीका; सबके जलवें चढ़ के उतर जाते है
उनके संग जैसे – जैसे है समय गुजरता सब समा जाते है उनके जलवे में।
कोई भेद नजर नहीं आता, सब तरफ हमारे प्यारे गुरू नजर आते है;
हर पल गूँजे कानों में मिश्री से उनके बोल।
गुरू हमारा दिलबर हैं, दूर रहके भी पास रहता है, मुस्कूरा के जीवन को शायरी बनाके जीना सीखाता है ।


- डॉ.संतोष सिंह