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Hymn No. 213 | Date: 16-Jul-1998
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बेसहारों का सहारा है वो, अनाथों का नाथ है वो;
बेसहारों का सहारा है वो, अनाथों का नाथ है वो;
वो ही जगन्माता है, वो ही संसार का पालन करता जगदीश्वर ।
ब्रज में छेड़े मुरली की तान, क्षीरसागर में करता है शयन; खुद में खोयें हुये
अयोध्या का धनुर्धारी है वो, काशी का विश्वनाथ ।
कहीं पे बनता है महाकालेश्वर, तो कहीं पे बाबा अमरनाथ;
हर पल रहता है अपनी धुनों में खोया ।
कभी चंदन का लेप लगाता, या फिर लपेट लेता है नश्वर संसार की राख;
मस्ती में आके नाचे वो कभी - कभी; भक्तों के संग झूम – झूमके गाता है वो।
कभी दौड़े अपने भक्तों के पीछे, बनके छलिया हँसा – हँसाके रूला जाता है;
बाँध लेता है खुद को मर्यादा में कभी; मुरली बजाके तोड़ देता है सारे बंधन को,
छोटा हो या बडा, स्त्री हो या पुरूष; पशु – पक्षी, पेड़ - पौधे सबके दिलों को हर लेता है वो;
रूप बदले, रंग बदले बदलता है हमारे दिलों को, अहसास ना होने देता ।
दूरियाँ खत्म करके अपने प्रेमियों के समीप रहता है वो सदा;
हर अदा रीझ जाती है उसकी, उसपे खुद को लुटा देने का मन करता है;
हर बंधन को तोड़के सब लोक लाज को छोडके उसका हो जाने का मन करता है।


- डॉ.संतोष सिंह