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Hymn No. 214 | Date: 17-Jul-1998
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दिल के मेरे तू इतना करीब है, फिर क्यों रहता है दूर – दूर मुझसे ;
दिल के मेरे तू इतना करीब है, फिर क्यों रहता है दूर – दूर मुझसे ;
मुझे नहीं पता कौनसी कमी के कारण; तू रहता है दूर मुझसे इतना ।
एक बार तू बता दें, इस कमीं को लाख – लाख कोशिश करके दूर कर दूँ मैं ;
मैं हार गया तो क्या, तेरे आशीष से खुद ब खुद वो कमी दूर हो जायेगी मुझसे ।
सब कुछ पा लिया तो क्या, जब तुझको अपने दिल में बसा ना सका,
मेरी तडप है अधूरी; पूरी होगी उस दिन जब तू मेरे मन – मंदिर में आके बस जायेगा।
किंचित मात्र भेद ना होगा, हर पल तू रहेगा, तन – मन में समाया;
अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुये, मैं भी तुझमें रमता रहूँगा ।
इतने बुरे ना है हम; तेरे संसार के इक् कण है हम;
सब कुछ करकें क्या फायदा, जब खुद को हवाले तेरे कर ना सका मैं ।
बैरी बन जाऊँ मैं इस संसार का, तो भी ना है मुझे कुछ गम;
जन्नत के द्वार को ठुकराना पड़ा तो ठुकराऊँ, मैं तो बस तुझमें रमना चाहूँ।


- डॉ.संतोष सिंह