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Hymn No. 2152 | Date: 02-Feb-2001
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मेरी आंखे चौंघीयाँ जाये देखके तेरे मायावी संसार को।
मेरी आंखे चौंघीयाँ जाये देखके तेरे मायावी संसार को।
कितना भी रह लू करीब किसीके समझ न पाऊँ वर्तन को।
तुने न कोई कमी की देने में, तो कैसे बन गया खान कमियों का।
भान रहते बेभान रहा, जिंदगी को बेजान सा धोता चला गया।
उबरना चाहता हूँ इन सबसे, बसेरा पाना चाहता हूँ पास तेरे।
आस टूटी नहीं काश का रोना रोने नही चाहता तेरे पास रहते।
आहत कई बार हुआ अब निजात पाना चाहूँ फजी हतो से।
हर कदम पे मजबूर हूँ भटकने को, फिर भी रूकना चाहूँ पास तेरे।
मिथ्या प्रलाप किये बिना कर दिखाना चाहूँ तेरे नाम पे जो चाहे तू।
हारा जरूर हूँ पर हार माना नहीं, बेंअसर है जिंदगी में हर गम।


- डॉ.संतोष सिंह