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Hymn No. 2154 | Date: 07-Feb-2001
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राही हूँ अनजान डगर का, करता हूँ प्रयास तेरी और बढ़ने का।
राही हूँ अनजान डगर का, करता हूँ प्रयास तेरी और बढ़ने का।
राह में ठोकरे खायी न जाने कितनी बार, फिर भी न किया कबूल रूकना।
तन ने छोड़ा साथ, मन ने की मनमानी, सब कुछ सहते हुये तेरी ओर चला।
इच्छाओं में आसक्त हुयी इंद्रियाँ, सुख दुख को भोगा न जाने कितने पुरूषो ने।
दिलबर दुनिया भरके थपेड़े हर बार सहते हुये धीरे धीरे तेरी और बढा।
जकड़ा न जाने कितने मोहो में, बड़ी मुश्किल से छूटता तेरे नाम का सहारा लेके।
कहर डाला करमो ने, दिया जनमों जनम का विशाल अनजान सफर।
श्वास छूटी पर न छूटी आस, अथक प्रयास करते हुये प्रियतम तेरी ओर चला।
डोरे डाले न जाने कितने कामनाओं ने, कैसे कैसे बताऊँ पग पग पे थी कितनी लालसाये।
कभी फंसा कभी बचा उसपर हर बार दिल ने तेरी याद दिलायी, यादआते ही तेरी और चला।


- डॉ.संतोष सिंह