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Hymn No. 2158 | Date: 09-Feb-2001
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कब कोई कैसे चला जाये, कोई न जाने रे।
कब कोई कैसे चला जाये, कोई न जाने रे।
जो जाने वो किसीको न दर्शाये रे।
खेल है अजीब दुनिया में, कही जीवन तो कही मौत है रे।
मौत तो कोई गैर नहीं, वो बन बैठा है खुदका।
खुशियों से भरे जीवन में, कब चुभ जाये दुःखों का कांटा कोई जाने ना रे।
तड़प उठता है, जब प्राणों का साथ घुटते देखता है रे।
होश रहने पे पिया मदहोशी का प्याला, वक्त आनेपे पछताये बहुत।
जीवन चक्र पलों में सिमट जाता है, एकाएक नजरों के सामने।
फिर भी सीख कोई नही लेता, जानके के करम वही है करता।
करनी की भरनी तो पड़ती है भरनी, चाहे उसके करे या खुशी से।


- डॉ.संतोष सिंह