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Hymn No. 2159 | Date: 13-Feb-2001
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एक होके न जाने कितने रुप तूने बनाये।
एक होके न जाने कितने रुप तूने बनाये।
अपने भक्तो को रिझाने के वास्ते, न जाने कितनी रास रचाये।
ऐसा तो कभी तूने न कुछ मांगा, जो न दे सके हम।
प्यार के बदले प्यार ही चाहा, विश्वास से भरा भाव मांगा।
हम भूल बैठे अंतर में बसा है हमारे तेरा ही स्वरूप।
एक बार नही न जाने कितनी बार अहसास कराया समर्थता का।
दुनिया के रागों से मुक्त करके प्रेम का पाठ पढाय़ा।
क्या न किया तूने हमको अपना बनाने के वास्ते।
कर्मों की मार सहते हुये दिया छाँव प्रेम से भरा।
ऐ परम् तेरा अहसान चुका सकता नहीं, हाँ तेरा बनके मिट सकता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह