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Hymn No. 2164 | Date: 15-Feb-2001
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किसको दोष दूं, क्यूँ दोष दूं समझ नहीं आये।
किसको दोष दूं, क्यूँ दोष दूं समझ नहीं आये।
खेल किस्मत का है, स्वामी पुरूषार्थ मैं तो कैसे उबर पाऊँ।
दिल्लगी कौन किससे कर रहा है नाम किसका दे रहा है।
बेकार है मेरे आँसू जो बह पड़ते है कही भी थोड़ा कुछ होने पे।
उधार की है हंसी, जो बना बैठा है मसखरा लोगों की नजरों में।
जमाने का दस्तूर है, इसमें तेरा क्या कसूर औरो की तकलीफ तकलीफ जो नहीं होती।
मौत के बाद क्या होता है, जिंदा रहने पे जो मुँह फेरे रहते है अपने।
ये कैसा आबाद कर रहा है तू, जो जश्न मनाने को कहे बरबादी पे अपने।
शुरूआत में जो जज्बा था कुछ कर दिखाने का, वो तो लग गया जर्रानवाजी में।
होश में न तब था, न अब, तेरी दुनिया से एक और कम हुआ तो क्या गम।


- डॉ.संतोष सिंह