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Hymn No. 2165 | Date: 16-Feb-2001
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खुदा की खिदमत में जाते है, खुदा की रहमत से।
खुदा की खिदमत में जाते है, खुदा की रहमत से।
खिदमत क्या करते है बस आफत ही होते है खुदा के वास्ते।
बानगी देखिये उसकी, करता नहीं कोई कमी खानगी में।
दे देते है दोष अक्सर, जब रह जाती है कमी कोई खुद में।
चल पड़ता है दौर शिकवाईयों का नजरअंदाज करके रहमतों को।
अपना किया हुआँ भुलाके, उठाते है उंगली हालातों की ओर।
आन, बान, शान छोड़े बिना बनना चाहते है खाकसार।
शर्मशार होते नही अपने किये हुये पे, देखते है औरो को।
निकले थे नूर बनने आँखो के तेरी, इम्तहां के आने पे हो गये चकनाचूर।
पार पा नहीं सके, तोहमत लगाते बैठे है खुदा और जमाने पे।


- डॉ.संतोष सिंह