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Hymn No. 2167 | Date: 16-Feb-2001
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लुट गया, लुट गया अपने ही हाथों प्रभु कई - कई बार लुटा।
लुट गया, लुट गया अपने ही हाथों प्रभु कई - कई बार लुटा।
जिन हसरतों को अपना माना था, उन्होंने सरेआम लुटा।
बाकी जो कुछ बचा था उनको इच्छाओ ने फिर से लुटा।
दोष इसमें किसीका क्या है, लूटने का मौका तो हमने दिया।
नादानियों की राह पे मैं जो चला था जो नाकामियों का सिला मिलना तय था।
हाथ पकडे रखा था तेरा, फिर भी अदावतों से न मन भरा।
दोष देता न जाने कैसे मैं किसीको, जब खेला खेल खुद से।
ऐसा न था याद आती न थी, पर पहचान जो पक्की हुयी न थी।
लुटने निकला था तुझको, लुटता चला गया खूदको।
हाल देखके मेरा बरतनां ऐतिहात लोगों, प्यार के सिवाय लुटना न कुछ।


- डॉ.संतोष सिंह