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Hymn No. 2168 | Date: 17-Feb-2001
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तेरे आंगन में खड़ा है इक् बालक, जो पुकारे तुझे यूं ही।
तेरे आंगन में खड़ा है इक् बालक, जो पुकारे तुझे यूं ही।
उसे न पता है दुनिया के रीति रिवाज, वो तो पुकारे तुझे यूं ही।
सुना है बहुत कुछ लोगों से, पर जाने न अर्थ किसीका।
किसको कहते है मोह माया, जब गरज पड़े लगा ले डुबकी उसमें।
कह सकते हो जानवर से भी बदतर है जीवन, पर उसको न समझे कुछ।
याद आये उसको प्यार, या देता है जब कोई दुत्कार, अकारण या कारण से।
मचल उठता है दिल छलक जाते है आँसू, भागके पिता पहुँचंता है तेरे पास।
औरो की न लगती है अब इतनी, जितनी तेरी बातें दिल को है चुभती।
अब चाहत है दिल रहे वो तेरे पास, करवाये तू कुछ भी छूटे न संतोष का साथ।


- डॉ.संतोष सिंह