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Hymn No. 2170 | Date: 17-Feb-2001
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प्यार भड़काये दिल में आग लगाके, तू ही बता बुझाये कौन प्यास मेरी।
प्यार भड़काये दिल में आग लगाके, तू ही बता बुझाये कौन प्यास मेरी।
इश्क होता है अश्क बहते है, जब बुझती नहीं प्यास दिल की।
झूठा है कौन, रूठा है कौन, प्यार की बात बनने की बजाय बिगड़ती ही जाये।
रस्म नहीं जानुं प्यार की, कसमें तोड़ना चाहूँ, तू ही बता कैसे निभाऊँ दस्तूर जमाने का।
इकरार है तेरे प्यार की, बरकरार रखना चाहूँ सांसें, तो कैसे बंध जाऊँ प्यार में तेरे।
इबादत भी करना चाहूँ, अदावत भी करता जाऊँ, तो कैसे चैंन आये मन को मेरे।
इक् और तेरी बाट जो हूँ, नजरें बचाकें नैन मटकाऊँ तो कैसे तेरा होके रह पाऊँ।
मोहब्बत के नगमें सुनाते हुये, जहां का राग अलापू, दिलबर खुद के संग कैसे खेल खेलूँ।
मेल करना चाहूँ तुझसे, मिलाप का ख्वाब देखूँ किसी और के साथ, तू ही बता कैसे तू आये मेरे साथ।
कब तक चलेगा ये दोतरफा दौर, करना चाहता हूँ खत्म तेरे प्यार के दौर में रबके।


- डॉ.संतोष सिंह