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Hymn No. 2173 | Date: 20-Feb-2001
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मन की बात मन ही जाने, दिल बिचारा खाये झटके तेरा नाम रटते – रटते।
मन की बात मन ही जाने, दिल बिचारा खाये झटके तेरा नाम रटते – रटते।
अपलक निगाहो से निहारुँ तुझे, हतप्रभ सा मैं कुछ समझ न पाऊँ।
दोष ही दोष है मेरे भीतर, पुकारूँ निर्दोष को उतना दूर चला जाये।
खेलती है किस्मत कर्मों का नाम लेके, चलाऊँ बाण पुरूषार्थ पर निशाना चूक जाये।
दशा हो गयी है मेरी पागलों जैसी, तेरे पास रहके तेरा हो न पाऊँ।
कितनी है विश्वास की कमी, जिसे मेरे आँसू भी ना धो पाये।
झोली फैलाये हूँ खड़ा भर दे तू उसे, जो बना सके समर्थ तेरे वास्ते।
मेरी प्रेम कहानी का एकमात्र नायक है तू, न प्रेमपात्र तो स्वीकार कर ले दास बने।
अरे पात्रता वालों को हर कोई अपनाये, गैर पात्रता वालो को कौन गले लगाये।
विवशताओं की बेड़ियाँ काटकें, निर्द्वन्द्र बना दे हमारे दिल को तेरा होने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह