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Hymn No. 2177 | Date: 20-Feb-2001
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कहते कह न पाऊँ रहा हूँ दिल में, जो कहना चाहूँ हर हाल में तुझसे।
कहते कह न पाऊँ रहा हूँ दिल में, जो कहना चाहूँ हर हाल में तुझसे।
राम कसम जितना भी कहूं उतना कहना चाहूँ, पूरी हो जाये दिन पूरी न हो बात।
संजिदगी भरा व्यवहार करके बताना चाहूँ, तो कभी उन्मुक्त होके गाऊँ जो बताना चाहूं।
मेरा हाल ऐसा क्यूँ है, कहा हुआ करके दिखाना सही अर्थ में तेरा होता है।
मैं अपनी बातों को समझा सकूं या न पर मेरे दिल के हाल को तेरे सिवाय कोई जाने न।
अफसाना लिखते लिखते तेरे मेरे प्यारका बन जाना चाहता हूँ फसाना।
मौन होके मंद मंद मुस्कराते बंद होके दिल के कमरे में जीना चाहता तेरे संग।
छोड़ना चाहता हूँ दुनिया का साथ, जो हो मेरे हाथों में तेरा हाथ ओ मेरे प्राणनाथ।
कर सकता हूँ तू पूरी मेरी अनकही बातों को, दिल का हाल समझे तू मुझसे ज्यादा सही।


- डॉ.संतोष सिंह