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Hymn No. 2178 | Date: 20-Feb-2001
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इंसा के खेल में हूं जानवर कितना अजीब, जो करे अपनो पे वार दुश्मनों को छोड़के।
इंसा के खेल में हूं जानवर कितना अजीब, जो करे अपनो पे वार दुश्मनों को छोड़के।
मनाने वालों ने भी छोड़ा साथ, हाय री किस्मत पाये हुये प्यार को अपने ही हाथों लूटा।
फिर भी करता हूँ सलाम, जो श्वासों को भुलाके करते है प्यार दिल से अपने चाहने वालों को।
तड़प देखके उनकी घबरा जाता है मन, तेरे ही माटी के पुतले जब हराते है तुझे प्यार के खेल में।
सजदा करता हूँ सच्चे अंतर से उनकी, प्रभु नजर उससे पहले छीन लेना तु नजर मेरी।
हाँ इतनी सी चाहत रहती है इस कंगले को, उनकी तड़प देखके सिखा सकूं तेरे वास्ते।
झूठी होगी शायद मेरी बात पर इस सच को कर न सकता नजरअंदाज तेरे बगैर औकात नहीं मेरी।
देने को न है कोई अदभुत गीत, या फिर पुरूषार्थ से भरा कोई अतुलनीय प्रयास जो मेरी जीत ।
फिर भी सींचना चाहता हूँ अपने आपको तेरे प्रीत से जीत जाने के वास्ते तुझे।
मुझे न चाहिये किसी हिस्से का भले ही न हो मेरा हिस्सा, पर रखुं तेरी चाहत अपनी चाहतों से पहले।


- डॉ.संतोष सिंह