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Hymn No. 2183 | Date: 20-Feb-2001
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चलते हो सिलसिला अनवरत् गीतों का, अगर रूचतें हो तेरे दिल को।
चलते हो सिलसिला अनवरत् गीतों का, अगर रूचतें हो तेरे दिल को।
थक जाते हो मेरे हाथ, अटक जाये मेरे श्वास, पर रूकें ना कभी गीत।
सुनाता जाऊँ सुनते तू रहना, श्वासों के कारण खंडित ना हो कभी।
जो कुछ भी पाया तेरा है दिया हुआ, अर्पित किया तो कैसे हुआ मेरा।
अगर बची है कुछ अविश्वास तो उसको तू मिटा दे परम् विश्वास दिलाके।
सिलसिला चलता रहे तेरे मेरे प्यार का चाहे खत्म हो जाये जीवन का ये पन्ना।
सानी नहीं रखता हूँ अपने आप में मनमानी न करने देना तू मुझे।
पिया हुआ हूँ तेरे हाथों से प्यार का प्याला, इल्जाम लगने ना देना कभी।
इनाम नहीं चाहिये कोई, बईमान होने न देना तेरी नजरों में कभी।
अर्पित किया हुआ हूँ सब कुछ चरणों में तेरे, न चाहिये तेरे सिवाय कुछ मुझे।


- डॉ.संतोष सिंह