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Hymn No. 2187 | Date: 22-Feb-2001
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परम्, परम्, परम्, अदा करूं तेरा शुक्रियाँ बार बार तो भी होगा कम।
परम्, परम्, परम्, अदा करूं तेरा शुक्रियाँ बार बार तो भी होगा कम।
गुजार दूं जीवन तेरा धन्यवाद करने में, फिर भी मायने नहीं कोई तेरी कृपा के सामने।
लाखों लाख बार करूं तेरे नाम का जयघोष, तो भी तेरी अनुकंपा की बानगी कहलायेगी।
रीत रिवाजो को कितना भी मना लूं, मौका तो देता है तू अपनी सहृदयता की वजह से।
मुश्किल है बयाँ करना तेरी महानता का, कोई औकात नहीं इस अदने का।
तेरी हर दास्ताँ है अमर प्रेम की कथा, हर शब्द में भरी है करूणा की काव्यता।
बुझाता है तू न जाने कितने तरसती आत्माओं का प्यार, फिर भी भरा रहा है ज्यों का त्यों।
जितना कुछ कहूँ कम लगे दिल को, कहने की प्यास बढ़ती जाये मेरे दिल की।
महासागर है तू पर उसमें होती है बूंद की कुछ ना कुछ औकात, पर उससे हम कोसों दूर है।
फिर भी बिना किसी फिकर के गाऊँ गीत तेरा, रखना तरबतर तू मुझको उसमें अपनी कृपा से।


- डॉ.संतोष सिंह