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Hymn No. 2188 | Date: 23-Feb-2001
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हें। आयों रे आयों समायों मोरा चित्त में, घनश्याम तोरी छवि।
हें। आयों रे आयों समायों मोरा चित्त में, घनश्याम तोरी छवि।
था तो वो पहले से रे।, उकर आयो छवि ख्वाबों से यादों में।
हें। इतनी मोहनी सुरतिया जो देखे खो दे सुध बुध अपनी।
बड़ी मिन्नत से मिलो दर्शन, खुद श्याम भी तरसे है। आयों...।
इक् बार जो देखे अपलक देखतो रह जाये।
कोई कहे त्रयम्बक, तो कोई पुकारे अमर, न जाने कितनो नाम महाअवतार घरे।
युगों युगों से प्यास बुझावे, प्रेम और ज्ञान की गंगा वसुंधरा पे बहावे है।...।
बड़भागी बन्यो संतोष, जो सद्गुरूकृपा से पड़ी छाप मनमोहन की।
अब तू अनुमति मांगू गावत फिरुं चारो दिशाओं में गीत मनभावन की
बिन् सावन के बरसना चाहूँ सद्गुरू तोरे आंगन में है। आयों...।
- डॉ.संतोष सिंह
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