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Hymn No. 2191 | Date: 24-Feb-2001
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क्या बात कुछ ऐसी तो न है, इक् सन्यासी कैसे करे प्रेम इक संसारी से।
क्या बात कुछ ऐसी तो न है, इक् सन्यासी कैसे करे प्रेम इक संसारी से।
दस्तुर है दिल का वो तो न देखे कोई भेद, नैनो के लड़ते कर बैठे वो प्रेम।
पाने पे भी वो करता प्रेम, खो देने पे वो तड़पता प्रेम में, मतलब नहीं हार जीत का।
सोचके कुछ होता नहीं प्रेम में, जो सोचा गया होता नहीं कभी होता है वही।
न रोको मुझे न ही टोकी, मैं बन चुका हूँ समिधा होम हो जाने दो प्रेम की वेदी पे।
लगायी हुयी है आग तेरी, कर ले न कितना भी, बुझाना पड़ेगा तुझको ही।
दिलासे न चलेगा काम अब, दिलासे के नाम पे कर ले तू अब कितना भी अत्याचार।
तेरी मर्जी कुचल दे या संवार दे, संवारा है अपने प्यार को रात दिन एक करके।
तू कर सकता है नजरअंदाज पर मेरे वश की बात नहीं, मैं तो रहा नही खुद का।
समझाना मत समझने न निकला हूँ, निकला हूँ तेरे प्रेम में रमने।


- डॉ.संतोष सिंह