Hymn No. 218 | Date: 19-Jul-1998
फिर, फिर, फिरसे तुझे निहारना चाहूँगा, फिर भी ना है मन भरता, फिरसे निहारने का दिल है करता।
फिर, फिर, फिरसे तुझे निहारना चाहूँगा, फिर भी ना है मन भरता, फिरसे निहारने का दिल है करता। फिर, फिर, फिरसे तेरा नाम लेना चाहूँ, फिर भी जी नहीं भरता तुझसे, फिर से तेरे नाम का जाम पीना चाहूँ। फिर, फिर, फिरसे तेरे ख्यालों में खोया रहता हूँ फिर भी मन नहीं माने, फिर से तेरे ख्यालों में खो जाना चाहूँ। फिर, फिर, फिरसे तेरे गीतों को गुनगुनाता रहता हूँ फिर जो आनंद का ज्वार आता है फिर से उस ज्वार में डूबकी लगाना चाहूँ । फिर, फिर, फिरसे तेरे प्रति दिल में बेचैनी का दीप जो जलता है उस आग को जलाये फिर से तेरे लिये बेचैन हो जाना चाँहू। फिर, फिर, फिरसे मन में तेरे लिये जो तडप उठती है फिर से उस तडप को बढाकें तुझमें लीन हो जान चाहूँ। फिर, फिर, फिरसे मन में तेरे लिये जो तडप उठती है फिर से उस तडप को बढ़ाके तुझमें लीन हो जाना चाहूँ। फिर, फिर, फिरसे आँसूओं में डूबना चाहूँ, जो विरह में उपजे है तेरे, फिरसे डूब जाना चाहूँ, तुझमें होश खो दे। फिर, फिर, फिरसे अपनी कलम तेरे आगे लिऐ बैठ जाना चाहूँ फिर से बेसुध होके एक नये गीत को जन्म देना चाहूँ । फिर, फिर, फिरसे तेरे नाम के शॉल में खुद को लपेट लूँ फिर से बस उसमें ही लिपटा रहना चाहूँ। फिर, फिर, फिरसे मन को सबसे फेर लूँ, फिरना फेरने को रह जाये तेरे नाम के सिवाय।
- डॉ.संतोष सिंह
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