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Hymn No. 221 | Date: 20-Jul-1998
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जब मान लिया तू ही है सब कुछ; सब में करे तू निवास;
जब मान लिया तू ही है सब कुछ; सब में करे तू निवास;
फिर मन में क्यों संदेह अपने, मेरे भ्रम को तू दूर कर दे ।
तू पालनहार, तू तारणहार, मंदिर – मस्जिद में तू करे निवास;
नाम तेरे अलग – अलग है तो क्या, रूप तेरा रहे या ना रहे।
तेरे गीत तेरा संदेश हमेशा से है एक, प्यार के बिन अधूरी है प्रार्थना,
इसके बिना तुझे पाने की हर तमन्ना है झूठी; प्रेम में तू रहे सदा ।
फिर मन क्यों भटके ओंछे धारणाओं में, तुझको लेके डर क्यों लगता है,
क्या वो वहम् है हमारे मन का, मन के अंदर बसी हुई प्रथाओं का।
मेरी हर चीज बंधी है तुझसे, बाँधना चाहूँ मैं खुदको तुझसे ;
अज्ञानी मैं, तेरे सिवाय् कुछ भी न जानूँ, मेरे मन को तू ही निशंक बना।


- डॉ.संतोष सिंह