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Hymn No. 222 | Date: 21-Jul-1998
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पल – पल में क्या से क्या हो जाता है, चले थे तेरी और
पल – पल में क्या से क्या हो जाता है, चले थे तेरी और
कदम क्यों मूड जाते है, कहीं और के लिये।
ये कैसी है, परीक्षा, जो देनी रहती है; हर एक को जरूरी;
उलझ जाते है हम अपने आप में तेरी और बढ़ नहीं पातें ।
सचमुच सब खामियाँ छुपीं हुई है हममें, हमारी चाहत –
सच्ची नहीं है तेरे प्रति, गैरजरूरी ढंग से जीते है हम ।
हमारे अंदर लगन नहीं, तेरे लायक अभी बने नहीं;
तुझसे जुडने के लिये, संसार की चाहत बनी हुयी है हममें।
जो भी है हमारे अंदर कमीं, स्वीकार करें या ना करें हम
पर तेरे लिये वफादार है, हमारा ईमान सच्चा है ।
तू करूणा का सागर, तेरे पलक झपकने की देर है,
दुनिया बदल जाती है, बस तेरी चाहत से ।
मेरी क्या है बिसात तेरे सामने, तू चाँह लेगा एक बार
मैं तो क्या, मेरी दुनिया बदल जायेगी।


- डॉ.संतोष सिंह