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Hymn No. 223 | Date: 21-Jul-1998
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तेरी सलामती की दुआ मैं तुझसे करता हूँ, तू ही रचता है संसार को;
तेरी सलामती की दुआ मैं तुझसे करता हूँ, तू ही रचता है संसार को;
तेरे सिवाय ना कोई पूजा जो सलामत रख सके तुझको और इस जग को।
ये तेरी माया का खेल कभी बनाना, कभी मिटाना, सब कुछ अपने में समा लेना;
नजरों से दूर रहता है तू हमशा, पर हमारी दुःखों को तू ही सहता है, बिन बताये हमको ।
हम भी तेरे खेल के एक अंग है, दिया है तूने सामर्थ्य हममें, तेरे पास आने का;
पर मजबूर हो जाते है हम, अपने दुःखों के आगे सर झुका लेते है एक जानवर सा जीवन जीते है।
अविश्वास की गाँठ जो पड़ चुकी है सदियों से दिल में हलचल मचायें रखती है हर पल
पर आस की किरण दिलों में तू ही जलाये रखता है, हमको अपना तू ही बनाये रखता है ।
हम जानते है तूझे कुछ भी दे नहीं सकते, जो कुछ भी देंगे तुझे, वो तेरी कृपा से मिलता है हमको;
अपने प्यार से सींचा है तूने हमारे दिलों को, उस दिल की हर धडकन दुआ करेगी तुझसे तेरी सलामती के लिये ।
- डॉ.संतोष सिंह
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