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Hymn No. 225 | Date: 23-Jul-1998
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कह नही सकता – क्या – क्या कमीं है हममें; झाँक के अपने भीतर देखते है तो कमियो की खान पाते है ।
कह नही सकता – क्या – क्या कमीं है हममें; झाँक के अपने भीतर देखते है तो कमियो की खान पाते है ।
इस अँधियारे मन के गलियारे में, आस की किरण तेरे नाम के सहारे जलती है ।
इच्छाओं और चिंताओं के तूफां के सामने लपलपाती है, बुझ भी जाती है कभी – कभी ।
पर अंदर ही अंदर सलगती है, तेरे पास आनें का राह दिखाती है ।
सुलगते – सुलगते फिर से जल उठती है, धृत समान तेरा प्यार पाके ।
तेरे आँचल का सहारा पाके होश खो देती है, और तूझे पाने की तमन्ना कर बैठती है।
फिर कहीं से दुःख – चिंताओं का झोंका आ जाता है, जहाँ से चले थे, फिर वहीं जा पहुँचते है।
हार न मानेंगे हम तेरी कृपा से, जो सीने में प्यार की जोत जली है बुझने ना देंगे ।
उसमें आहुति दे देंगे तन – मन की, पर सदा जलाये रखेंगे उसे ।
जलते रहेगे सदा परवानों की तरह, तडप बढती जायेगी तुझपे कुबाँ हो जायेगे हम।


- डॉ.संतोष सिंह