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Hymn No. 228 | Date: 24-Jul-1998
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जिसके आगे सब शोभा है फीकी, उसकी शोभा मैं क्या बढ़ाऊँगा ।
जिसके आगे सब शोभा है फीकी, उसकी शोभा मैं क्या बढ़ाऊँगा ।

जो बाँटे सब कुछ अपना सारे संसार को, उसको मैं क्या अर्पित कर पाऊँगा।

जो खुद सजा सँवरा है अकाल पुरूष, उसको नाशवान चीजों से मैं क्यों सजाऊँ।

जो अजन्मा है, अनित्य काल से, उसका मैं क्या जन्मदिन मनाऊँगा।

जो है सब कुछ जानता, उसको मैं क्या – क्या बताऊँगा ।

बड़े – बड़े ऋषि – मुनि जिसकी अर्चना करते, मेरे जैसे क्षुद्र की क्या बिसात।

मैं तुझको कैसे दीप दिखाऊँ, तुझसे आलोकित होता है सारा ब्रह्माण्ड ।

मैं तेरे आगे कौनसी घंटी बजाऊँ, तुझसे उभरा है ब्रह्मनंद ।

मैं तेरी सुंदरता को किस चंदन सेली से बढ़ाऊँ, तू तो मोह लेता है मोहन बनके ।

मैं तुझको कौन सा गीत सुनाऊँ, जो हर अक्षर उभरा हो तेरे डमरू से ।

मैं तुझको कौन सा नाच दिखाऊँ, मस्ती में आके तू करे तांडव, सारा जग काँप उठे।

तेरे आगे बड़ी – बड़ी मैं क्या हाँक लगाऊँ, जिसने भी तेरे ज्ञान का अमृत चखा वो तेरे चरणों में गिर कर रो पड़ा।

मेरे मन के कोने में इक् छोटा सा फूल है, जिसका नाम प्यार है, डरते सकुचाते हुये उसे मैं तेरे चरणों में चढ़ाऊँ।


- डॉ.संतोष सिंह