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Hymn No. 229 | Date: 24-Jul-1998
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ऐ पिता जग का कोना – कोना छान मारा, पर तुझें ना पाया ।
ऐ पिता जग का कोना – कोना छान मारा, पर तुझें ना पाया ।
थक हार के जब घर को आया, शांत मनके कोने में तुझको पाया।
अदभुत है तेरी लीला जो भटके तेरे लिये, उनके साथ है तू भटकता।
जो दिन – रात मंदिरों में है सर पटकते, अपने मन में ना झाँकते – फिरते ।
वो कैसे तेरी लीला देख पायेगा, नये नये गीत तुझको कैसे सुनायेगा ।
तुझको अर्पित करते है बहुत कुछ, पर ना कर पाते है अपने दिल को ।
तुझे छोडके भागते फिरते है तेरी माया के पीछे, माया तो मिल जाती है पर तू रह जाता है
हम तो बस तेरी कृपा चाहते है, अपना मन – मंदिर तुझको सौंपते है ।
ज्ञान लेके क्या करेंगे दंभी बन जायेगे हम, बना दे तू हमें मतवाला तेरा ।
भूख – प्यास की चिंता ना होगी, ना होगा डर तन की धूप – बरखा का ।
इन सबसे ऊपर हर लोक – लाज को छोडके, बतियाते रहेगे तुझसे अपने पागलपन में ।
पागलों को तो रहता है सब कुछ माफ, मंदिर हो या मस्जिद हर जगह तेरी सजदा करते फिरेंगे


- डॉ.संतोष सिंह