VIEW HYMN

Hymn No. 230 | Date: 25-Jul-1998
Text Size
कुछ भी रास नहीं आता हैं, मन को तेरे संग के सिवाय,
कुछ भी रास नहीं आता हैं, मन को तेरे संग के सिवाय,
बेचैन सा हो जाता है मन, अगर तेरे पास पहुँचने में घड़ी भर को देर हो जाये ।
लगन मन को बस अब तेरी है, हर कार्य में याद दिलायें,
जतन अब बस तेरा ही करता है, लुटाना पड़े भलें ही सब कुछ ।
नमन् हर पल तुझको ही करना चाहूँ, रहे चहरा सामने कोई और क्यों नहीं;
दामन तो करना है इंद्रियों का, जो सदा से बाधा डाले तेरे मेरे बीच में ।
आज्ञा किसी भी कार्य को करने से पहले, बस मैं तेरी लेना चाहूँ,
सौंपना चाहूँ मैं खुदको तेरे श्री चरणों में, हुक्म की तामील के लिये।
अपने सभी रिश्ते – नाते जोड लूँ मैं तुझसे, तेरे सिवाय कोई भी ना मेरा,
मेरे मन मंदिर के दर को हर पल खुला रखूँ, कब श्री प्रवेश कर जाये ।


- डॉ.संतोष सिंह