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Hymn No. 2404 | Date: 26-Jul-2001
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कैसे बताऊँ दिल का हाल क्या है, यहां वहा फंसा है जो दुनिया के जाल में।
कैसे बताऊँ दिल का हाल क्या है, यहां वहा फंसा है जो दुनिया के जाल में।
मन होता है बेहाल, जब व्यवहारों का किरदार न निभा पाता हूँ ठीक से।
आस का टोकरा लादे मन पे घूमता हूँ, निराश होने से बचता हूँ तेरी कृपा से।
त्यज नही पाया हूँ अपनी इच्छाओं को, तेरे कहें मुताबिक करने को कोशिश करता हूँ।
खेल किस्मत का हमसे है जो कर्मों के डोर से बांधे रखा हूँ खुद को अब तक।
गुहार लगाता हूँ तुझसे ऐ बिगड़ी बनाने वाले, सुधार दे तू जिंदगी मेरी।
कमिंयों तो अनेक हैं मुझमे, कमियों के बिना मिलता कैसे ऐ तन मुझे।
मिला है मौका तुझसे जुड़ने का, ओर संसार में रहके तेरा कहा कर दिखाने का।
सताने से बचाना नहीं चाहता हूँ, पर सताये कुछ भी उससे परे हो जाना चाहता हूँ।
राहत मिलती है तेरे पास रहके, कुछ भी करले तेरे अनुरूप हो जाना चाहता हूँ सदा के लिये।


- डॉ.संतोष सिंह