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Hymn No. 2405 | Date: 29-Jul-2001
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उमड़-घुमड़ के बरसें बरखा, चहूँ ओर बहें बहार।
उमड़-घुमड़ के बरसें बरखा, चहूँ ओर बहें बहार।
गरज–गरज के गीत गावें, तोरे प्रेम की पड़े जो फुहार।
बिजुरिया कौंधे रह – रहके, जैसे यादें हिलोरे ले मन में।
किल्लोल कर उठता है जीव-अजीव, भीगके जैसे नवश्रृंगार करे दुल्हनिया।
अरे... माटी में प्रांण फूके, जो डूबे प्रेम के अमृत में।
झूम उठता है सारा जगत, सावन के हिंडोले में।
तरसत चकोर की प्यास बुझे, जब पड़े स्वाती नक्षत्र की धार।
रह–रहके करूँ करुण पुकार, कब होगी पुरी मोरे दिल की आस।
बरस दर बरस सावन आवे, कब करेगा तरबतर मोरे दिल को।
तन मन को बांध ले प्रेम पाश में, पूरी हो जाये मेरे अंतर की साध।








28th July 2001

नही, नही में असंतोष जागा ओर नहीं के कारण दुनिया में प्रवेश हूआ।


- डॉ.संतोष सिंह