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Hymn No. 2406 | Date: 29-Jul-2001
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आजा... आजा आज करुँ कुछ नया तोरा श्रृंगार, कि तू भी रीझ उठे।
आजा... आजा आज करुँ कुछ नया तोरा श्रृंगार, कि तू भी रीझ उठे।
दिल के चंदन को घिस घिसके, लगाऊँ माथे पे तिलक तोरे।
पखार दूं तेरे चरणो को, अपने विरह से उपजे आसुओं से।
रेशम के कपड़ो को बुन दूं, अमर प्रीत के तानबाने से।
रोम रोम तेरा झूम उठे, उतारूं आरती किसी नये प्रेम गीत से।
कानों में डालूँ कुंडल प्रयासों के, माथे पे पहनाऊँ पुरूषार्थ का मुकुट अपने।
गले में हार डालूँ तोरे अपने भावों को पिरो कें।
सब कुछ दिया हुआ है तोरा, लपेट दूं करधनी बनाके कमर में तोरे।
मन को रांध रांधके मोरे, बनाऊँ चरण पादुका तोरे वास्ते।
कुछ भी रह न जाये पास मोरे, वारी जाऊँ कमल का फूल बनके।
- डॉ.संतोष सिंह
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उमड़-घुमड़ के बरसें बरखा, चहूँ ओर बहें बहार।
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बिताये न बीते तोरे बिना, काटे ना कटे पल लगे परबत से।
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