Hymn No. 2410 | Date: 04-Aug-2001
चल पड़ा, चल़ पड़ा हर हाल में चल पड़ा तेरी ओर, नामुमकिन को मुमकिन करने के लिये।
चल पड़ा, चल़ पड़ा हर हाल में चल पड़ा तेरी ओर, नामुमकिन को मुमकिन करने के लिये। पड़ाव आते गये कभी हंसीके, तो कभी दुःखों के, मुस्कराते आगे बढ़ता चला, चल पडा, ताना बाना बुनता गया मोह का, चुपचाप निभाते दायित्वों को तोड़ते हर जाल को चल पडा कभी हिकारत बरसती है, तो कभी स्वागत होता है, मुस्कराते हाल देखके अपना पर, चल पड़ा दोस्त देते थे प्यार की कसमें, दुश्मन निभाते थे दुश्मनी की रस्में, चुपचाप चलता रहा, चल पड़ा कभी बांधे कर्मों का बंधन, तो कभी रोके राह किस्मत मेरी, पर चलता चला, चल पड़ा कभी मिला था संतो का आशीर्वाद, तो कभी रोके अपनों का मोह, किया न मोह चलता चला चल पड़ा। कितनी बार खुदको रोके रखा था, तो हाथ पकड़ने प्यार से लेके चला तू चल पड़ा जितनी जितनी बार आयी बांधाये राह में, उतना ही मजबूत होता जायें इरादा, चल पड़ा
- डॉ.संतोष सिंह
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