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Hymn No. 2411 | Date: 04-Aug-2001
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रह तू अपनी बेफिक्री में, मस्त इतना, फिक्र न हो किसीकी।
रह तू अपनी बेफिक्री में, मस्त इतना, फिक्र न हो किसीकी।
करना न जिक्र तू कभी फिर की तो दिल में पनपेगा प्यार प्रभु का।
जो इक बार को प्यार का बीज पनपा तो श्रध्दा की ज्योत बढ़ते जायेगी।
उसके उजास में मिट जायेगी अंतर की सारी अंधियारी गलियाँ।
रोशन होगा मन का कोना कोना, रहेगा न तब कुछ किसी से कहना।
मस्ती की फूटेगी तरंग रोम रोम से, झंकार उठेगी दिल के कोने कोने में।
तब राज राज रहेगी न कोई भी बात, जानके अनजान रहेगा तू दुनिया में।
अनायास फूटेंगे गीत प्यार के, जो सुनेगा वो भी मचल जायेगा।
मजबूर होगा तू प्यार करने को, भूल जायेगा कौन अपना कौन पराया।
खत्म हो जायेगा भेद सारा जड़ हो या चेतन नर या मादा।


- डॉ.संतोष सिंह