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Hymn No. 2412 | Date: 05-Aug-2001
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निकल पड़ा इक ऐसी राह पे, जिससे था मैं अनजान।
निकल पड़ा इक ऐसी राह पे, जिससे था मैं अनजान।
विश्वास का दीप झिलमिला रहा था, जो कर रहा था रोशन राह को।
कदम दर कदम भरते हुये, बढ रहा था आगे पुरूषार्थ से।
हर अनजान मोड़ पे करता था राह सुनिश्चित श्रध्दा के जोर से ।
मिटाते जा रहे थे अबूझ कठिनाइयों को उपजते हुये निश्चल भाव से।
विवेक से कूद पड़े घार को चमका रहा था विनय भर निवेदन।
आसुओं की कलियाँ गिर रही थी, कुम्हलाये मन को नवजीवन देते हुये।
प्यार का सहारा जो लिये जा रही थी प्यार की मजिल की ओर।
धीरे धीरे बलि चढ़ा रहा था मैं, अपनी सारी प्रवृत्तियो को।
मिलने से पहले जो मैं जाना चाहता था निवृत्त मैं,


- डॉ.संतोष सिंह