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Hymn No. 2413 | Date: 05-Aug-2001
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मैय्या मोरी, मैय्या मोरी, मैय्या मोरी, दे दे मोहे तू ताड़ना अनेक, जो कर न पाऊँ कहा तेरा एक।
मैय्या मोरी, मैय्या मोरी, मैय्या मोरी, दे दे मोहे तू ताड़ना अनेक, जो कर न पाऊँ कहा तेरा एक।
दिया तूने इतने अच्छे कुल में जन्म, सार्थक कर न पाया दिया तेरा जनम, मैय्या
नख से शिख तक सर्वांग दिया, फिर भी मात खा जाऊँ दुनिया की माया से, मैय्या 2
इतना विमल विवेक दिया, फिर भी जगत व्यवहार में दूध का दूध पानी का पानी न कर पाऊँ
मन का विस्तृत आयाम दिया, उसको पकड़के तेरे पास पहुँचने की सरल राह बतायी।
भरे भाव दिल में कूट कूटके तूने, दबाता चला गया दुनियावी नश्वरता के पींछे।
पुरूषार्थ का पहनाया जामा किस्मत से लड़ने के लिये, फिर से रोना रोया असमर्थताओं का।
परमपिता सदृश्य सद्गुरू को भेजा तूने, पर उनकी भी बातों को झूठा करके दिखाया।
ऐसे न जाने कितने सूक्ष्म – विशाल आयुधों से सजाया जीवन के युध्दो को जीतने वास्ते पर बिना लड़े रखा आयुधों को मैय्या 2
हुंकार भर भरके कि कोशिश जगाने कि तूने फिर भी आलस्य से न बाज आया, मैय्या 2
- डॉ.संतोष सिंह
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निकल पड़ा इक ऐसी राह पे, जिससे था मैं अनजान।
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छा रहा है दिल पे प्यार का जोर धीरे धीरे, ले रहा है आगोश में तन मन को।
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