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Hymn No. 2416 | Date: 08-Aug-2001
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बरसत है घनश्याम नंदन कानन में, छायी लाली धरा पे हरियाली भरी।
बरसत है घनश्याम नंदन कानन में, छायी लाली धरा पे हरियाली भरी।
किलोल कर उठें पक्षी, तरसत चकोर ने कियो रखा प्रेम का रसपान।
लगी थी जिस दिल में विरह की आग, तन – भीगा, मन भीगा, बुझे सारे राग।
कोयलिया छेड़े कुहूँ - कुहू की तान, मिलावे सुर महोबा लेके पिया मिलन की आस।
रास आवे हर दिल को, जब पड़ी प्रेम फुहार हर चेतन अचेतन पे।
चमके बिजुरिया बदरवा में, जैसे मांग भरे कोई नई नवेली दुल्हनिया।
हो उठे साकार प्रभु के सारे ख्वाब, जो ओढ़ लीन्ही चदरिया प्रभु प्रेम की।
देख देखके मुस्कराये रसिया रास रचावे, जो पड़े हिठोले मनभावन के।
सुरम्य बनी सारी धरा, तरबतर होके खिले चहुँ ओर प्रेम की कली।
सींचे हर बरस प्रभु प्रेम रस से, हम न सीचे एक हू बार प्रभु के दिल को।


- डॉ.संतोष सिंह