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Hymn No. 2417 | Date: 09-Aug-2001
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है... आयो रे आयो, आयो रे आयो, जग को अपनी धुन पे नचाने गोविंद आयो।
है... आयो रे आयो, आयो रे आयो, जग को अपनी धुन पे नचाने गोविंद आयो।
छेड़ी जो तान मुरलिया की, मचल उठो दिल थिरक गयो सबको पग, हें आयो रे आयो।
झूम उठो सारा जग, दौड़ पड़ी सारी गोप, गोपियाँ, भुलाके दुनिया की लाज, हें आयो रे आयो।
तान से तान मिलाये पशु हो या पक्षी, बना जो वो सबके मन का साथी, हें आयों...
करे वो सबका काज, बताये न अपना राज, जिसने जैसो बुलायो बनके वो वैसा आयो।
था तो वो त्रिलोक का राजा, पर भक्त के काजे जूठन खायो, जूठन खाके झूमके नाचे।
शरणागत को पार लगाया, दोषियों को समझा – समझाके दियो उनके किये की सजा
अपने भक्तों की कसम निभाने वास्ते, तोड़के अपनी कसम शस्त्र उठायों, भक्त की लाज बचायो।
द्रौपदी की कातर पुकार सुनके, धर्मनिष्ठों की सभा में लाज बचायो, है आयो रे...।
छलिया छल के भी मोहता रहा मन को, व्यवहार की दुनिया में व्यवहार के साथ प्रेम का पाठ पढायो है आयो रें...।


- डॉ.संतोष सिंह