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Hymn No. 2420 | Date: 11-Aug-2001
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मटकी तोड़े गोपाल ग्वाल बाल के संग, रंगते हुये अपने प्यार के रंग में।
मटकी तोड़े गोपाल ग्वाल बाल के संग, रंगते हुये अपने प्यार के रंग में।
करे वो काज निर्गुण निराकार, जो राज न जाने बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी भी।
तरसते रह गये न जाने कितने सालों से, जो पड़s थे प्रभु के वास्ते वीरानों में।
मुठ्ठी भरके छाछ के वास्ते नचाये गोपियाँ कान्हा को करते हंसी ठिठोली।
प्रभु ऐसी कौन सी थी बानगी, जिसके वास्ते तू चला आया इन अधपगलों के पास।
खेल खेल मे ले तोहें दौडावे, मौका पाने पे कभी मुरली, कभी गेंद वास्ते छकावे।
रोनी सुरतियाँ लेके तू जाता यशोदा मैय्या के पास, दाऊ ओर उनके सखा की करता शिकायत।
ऐसी रास रचाता सुध बुध खोके बंध जाते सब तेरे प्रेम बंधन में।
मिटाता प्यास प्रेम सुधा की पान कराके, भवसागर के पार तू ले जा तू।
खेल खेलके में बजाता जो तू बांसुरिया, छोड़के लाज दौड़ आती गोप गोपियाँ तेरे पास।
- डॉ.संतोष सिंह
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बात है ये तो दिल की, नजरों से उतरके दिल में समा जाने की।
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